Friday, April 13, 2012

तुम फिर मिलने आजाओ ....


बरस रहा है रिम झिम सावन , फिर तुम मिलने आजाओ
ठंडी ठंडी रातों में ,तपिश प्यार की दे जाओ
प्यासे हैं हम भरा है गागर ,तुम गगरी छलका जाओ
अब तन्हा नहीं कटती रातें, तुम तन्हाई मिटा जाओ 

हाथों से स्पर्श करो और ,मन में दीप जला जाओ
आँखों से तुम गीत पढ़ो और ,मुझको मीत बना जाओ
होठों से कुछ और करेंगे ,आँखों से तुम बात कहो
मैं समझूं आँखों की भाषा ,तुम आँखों से काव्य गढो

मैं तुमको बाहों में भर लूं ,तुम मेरा प्रतिरोध करो
खेलूँ तेरी जुल्फों से तो ,तुम मुझसे गतिरोध करो
आत्मसमर्पण तुम करदो और ,मैं तुमको ले सेज चढूं
मूक सहमति तेरी पाकर ,मैं फिर से नई मूर्ति गढूं

Thursday, April 12, 2012

संसद और लोकपाल

लोकतंत्र का पावन मंदिर संसद गिरिजाघर है
मस्जिद ,गुरुद्वारा संसद है ,संसद सर्वोपर है
लोकतंत्र के मंदिर को अब साधक से ही डर है
मंदिर के अंदर अब तो अपराधी भी निडर है
जब चोरों को चोर कहो तो संसद क्यूँ थर्राती है
लोकपाल पारित करने से संसद क्यूँ कतराती है
संसद में जनता के प्रतिनिधि ईश्वर ही बन जाते हैं
जनता के सेवक होकर जनता को आँख दिखाते हैं
जो संसद की प्रभु सत्ता से स्वार्थ सिद्धि कर पाते हैं
ऐसे ही सांसद लोकपाल के नाम से ही डर जाते है
जनता को मानो जनार्दन मत उसका अपमान करो
जनता की आवाज सुनो और लोकपाल निर्माण करो ....

मतदाता ही नायक है

चोर लुटेरों को शरण दे रहे सत्ता के अधिनायक ये
अबलाओं से हो रहे व्यभिचारों के परिचायक ये
सत्ता के लोलुप लोगो का गुंडों से गठजोड़ हुआ
भ्रस्टाचारी शासन के सिंघासन का सिरमौर हुआ
राजनीति व्यवसाय नजर अब आती है
हर नेता के बेटे को राजनीति क्यों भाती है
जाति धर्म के आधारो पर जनता को ये बाट रहे
आरक्षण की बलिबेदी पर देश को अपने काट रहे
राजनीतिक दल परिवारो की जागीर नज़र अब आते हैं
चाटुकार - भ्रस्टाचारी ऊंची गद्दी पाते हैं .
आज व्यवस्था परिवर्तन की मांग यहाँ पर जायज है
भारत जैसे लोकतंत्र में मतदाता ही नायक हैं

Friday, December 5, 2008

मैं कविताएँ करता हूँ ...

मैं  आजाद पंक्षी हूँ आजादी पसंद करता हूँ ,
इस सून सान दुनिया में मैं वादी पसंद करता हूँ
बेरुखे मौसम में मैं बहारों कि बात करता हूँ
लोगो का दर्द समझने को मैं गरीबों कि याद करता हूँ
जनमानस का उद्धार करने को मैं ईश्वर से फरियाद करता हूँ
मैं किसी और से नहीं सिर्फ ईश्वर से ही डरता हूँ
समाज को सन्देश देने के लिए मैं नित कवितायेँ करता हूँ