Saturday, December 21, 2013

गिरता पुरुष ,मुखर होती नारी ...

१६ दिसम्बर २०१२ के बाद बहुत कुछ बदलाव देश में हुआ , विशेषकर महिलाओं की अस्मिता को लेकर एक बहस शुरू हुई और एक निष्कर्ष तक भी पहुची |संसद ने महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की रक्षा के लिए कड़े प्रावधान वाला कानून पारित किया किन्तु महिलाओं के उत्पीड़न की घटनाओं में कमी नहीं आई | कोई भी कानून दोषी को कड़ी से कड़ी सजा तो दे सकता है लेकिन अपराध होने से पूर्णतया नहीं रोक सकता |ये भी सच है लचर कानून अपराधों में बढ़ोत्तरी का कारण बनता है |
निर्भया के साथ हुए अत्याचार के बाद नारी उत्पीडन के प्रति सोते हुए समाज में नई चेतना तो जरूर आई किन्तु  पुरुषों का नैतिक पतन नहीं रुका |
२०१३ का वर्ष पुरुषों के नैतिक पतन का साक्षी बनकर इतिहास के काले पन्नों में सिमट जायेगा क्यूंकि इसी वर्ष समाज को धर्म का पाठ पढाने वाले आशाराम और उनके पुत्र नारायण साईं के महिलाओं के प्रति अधर्म के कृत्यों का पर्दाफाश हुआ |न्याय की मुर्ति कहे जाने वाले न्यायमूर्ति गांगुली ने एक लड़की के साथ कथित तौर पर अन्याय किया |समाज की कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकार तरुण तेजपाल ने अपनी बेटी की हमउम्र लड़की के साथ शोषण किया | राजस्थान में जनता का प्रतिनिधित्वा करने वाले एक मंत्री ने भी एक  महिला का शोषण किया |इन सभी घटनाओं को आसानी से नहीं भुलाया जा सकता क्यूंकि ये आधी आबादी के साथ हो रहे अन्याय की सूचक हैं |
इन सभी घटनाओं के खुलासे से इस बात को बल मिला है की अब महिलाएं अन्याय के प्रति मुखर हुईं हैं ,वो अब अपने को उपभोग की वस्तु बने नहीं रहने  देना चाहती हैं  |दिल्ली विधानसभा के अप्रित्याषित नतीजे भी इसी ओर इशारा करते हैं की महिलाओं की सुरक्षा एक अति महत्वपूर्ण मुद्दा है |किसी से मन के  भावों को व्यक्त करना गलत नहीं माना जा सकता किन्तु किसी का शारीरिक या मानसिक शोषण करने वालो को उचित दण्ड अवश्य मिलना चाहिए |
निर्भया के दर्द को जीने वाली देश की हर एक महिला में अत्याचार के प्रति आवाज उठाने की जो ऊर्जा उत्पन्न हुई है वो बनी रहनी चाहिए |निर्भया  का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा |अब किसी भी महिला के साथ निर्भया जैसा कुकृत्य न हो सके और कोई भी महिला अन्याय के प्रति शांत न रहे 

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